बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही

कुछ रोज़ हुए मैंने ख़ुद से इक बात कही
ख़ुद पे ऐतबार या तेरे वादे पे मलाल
राहों में तेरी रुक कर मैंने किया बहुत इंतज़ार
कुछ छोटी-छोटी सैकड़ो बात कही
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

बात करते-करते इक लम्बी रात हुई
दस्तक दिया ख़ुद को भीतर-भीतर ख़मोशी में
मैंने ख़ुद से कुछ बात कही
और फिर ख़ुद ही फेर के चेहरा
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

ख़ुद से पूछता हूँ मैं आज ख़ुद का पता
बड़ी अजीब सी बात है-
ख़ुद ही न रहा खुद का पता
पडोसी से पूछा तो सदमा-ए-बात हुई
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

आँखों में काले धुंए कुछ करते हैं सवाल
क्यों अचानक क्या बात हुई
क्यों सुलगती रही हर शाम, हर रात
आँखों से ही किये सवाल
और फिर देर तक –
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

आज मैं फिर बच्चा बन जाना चाहता हूँ

सब कुछ मिल गया जब मैं घर लौट गया
माँ की आँखों का प्यार फिर उमड़ गया
नाराज़ ख़ुद से होता या हालात से
कि क्यूँ हुआ दूर मैं अपने बचपन से
ले गयी खुशियो से दूर मुझे ये ग़ुरबत की लकीरें |

तरसा हूँ हर घडी तेरी लोरियों को माँ
थक के जब तेरी उँगलियाँ मुझे सहला देती थी
जब तेरी गोद में सर रख के सो जाता था मै
वो बचपन की रातें भी क्या कमाल थी |

तेरे हाथ से पकी रोटियों का स्वाद
और सबके रूठ जाने पर भी तेरा बरसता प्यार
मेरी आँखों की नमी तुझसे न छुपी कभी
हज़ारो गम भूल जाता था मैं तेरे गले लग
वो खो गयी सब बातें मेरे बचपन में ही कहीं |

आज फिर लौटा हूँ माँ सिर्फ तेरी ख़ातिर
कि बहुत सहा दर्द, बहुत सही ग़ुरबत,
सो लिया मैं भूखे पेट, और शायद जागा कई रातें तेरे बग़ैर
आ मुझे फिर अपनी गोद में लिटा, मेरे बालो में अपनी उंगलिया सहला
माँ तेरे आँचल में सिमट जाना चाहता हूँ
आज मैं फिर बच्चा बन जाना चाहता हूँ |

रेत सा फिसलता हर पल

रेत सा फिसलता हर पल
पानी से बहते जज़्बात
सन्नाटे की गहरी गूंज
फड़फड़ाता हर लम्हा
और, गहरी काली रात
हुआ था दिल कभी निस्बत
तेरे इश्क़ में मेरे प्यार
हम सदके में खुद को ही लूटा चले  |

ये ज़रूरी तो नही

जब बरसे बारिश
मेरा मन्न भीग जाये
ये ज़रूरी तो नहीं |

सफर में साथ थे जो
मंज़िल तक रहें साथ
ये ज़रूरी तो नहीं |

ज़िन्दगी की बात हो
और मैं जीया हूँ
ये ज़रूरी तो नहीं |

आग बुझी हो
और राख ठंडी हुई हो
ये ज़रूरी तो नहीं |

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