सही फ़रमाते हो

सही फ़रमाते हो- अब इश्क़ से कोई मतलब न रहा,
ये बात-बात पे ज़िक्र यार का, ये इशारा है किस बात का?

रह जायेगा सांस में

रह जायेगा सांस में,
या बह जायेगा इक क़तरा,
तेरे शहर में-
दिन गुज़ार भी लूँ,
यूँ अजनबी रहा हूँ,
तुझसे अब तक, पर मै!

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