दीवारोँ से लिपटा

जब दीवारोँ से लिपटा होता हूँ,
जब ख़ामोशी से मैं परेशां,
गुमसुम, उदास,
जवाब मांगता हूँ ज़िन्दगी से,
कि क्यों- ख़ुद ही किया,
खुद को बर्बाद
मैं खुश नहीं- और अब!
नहीं बचे हैं अलफ़ाज़
जो मेरे दर्द को करें बयां |

मचलती शाम की दहलीज़

मचलती शाम की दहलीज़ पर तेरा साया नज़र आया था,
तेरे गेसु की छांव या तेरी मोहब्बत की प्यास ने हमें बहोत तड़पाया था |

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