बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही

कुछ रोज़ हुए मैंने ख़ुद से इक बात कही
ख़ुद पे ऐतबार या तेरे वादे पे मलाल
राहों में तेरी रुक कर मैंने किया बहुत इंतज़ार
कुछ छोटी-छोटी सैकड़ो बात कही
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

बात करते-करते इक लम्बी रात हुई
दस्तक दिया ख़ुद को भीतर-भीतर ख़मोशी में
मैंने ख़ुद से कुछ बात कही
और फिर ख़ुद ही फेर के चेहरा
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

ख़ुद से पूछता हूँ मैं आज ख़ुद का पता
बड़ी अजीब सी बात है-
ख़ुद ही न रहा खुद का पता
पडोसी से पूछा तो सदमा-ए-बात हुई
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

आँखों में काले धुंए कुछ करते हैं सवाल
क्यों अचानक क्या बात हुई
क्यों सुलगती रही हर शाम, हर रात
आँखों से ही किये सवाल
और फिर देर तक –
बड़ी गहरी बड़ी लम्बी बात कही |

6 comments

  1. Very impressive writing.

  2. Nice lines, creative thinking. Keep writing such nice words! Good luck with your new blog.

  3. I am simply touched reading these lines. Really appreciated authors work (y)

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