आज मैं फिर बच्चा बन जाना चाहता हूँ

सब कुछ मिल गया जब मैं घर लौट गया
माँ की आँखों का प्यार फिर उमड़ गया
नाराज़ ख़ुद से होता या हालात से
कि क्यूँ हुआ दूर मैं अपने बचपन से
ले गयी खुशियो से दूर मुझे ये ग़ुरबत की लकीरें |

तरसा हूँ हर घडी तेरी लोरियों को माँ
थक के जब तेरी उँगलियाँ मुझे सहला देती थी
जब तेरी गोद में सर रख के सो जाता था मै
वो बचपन की रातें भी क्या कमाल थी |

तेरे हाथ से पकी रोटियों का स्वाद
और सबके रूठ जाने पर भी तेरा बरसता प्यार
मेरी आँखों की नमी तुझसे न छुपी कभी
हज़ारो गम भूल जाता था मैं तेरे गले लग
वो खो गयी सब बातें मेरे बचपन में ही कहीं |

आज फिर लौटा हूँ माँ सिर्फ तेरी ख़ातिर
कि बहुत सहा दर्द, बहुत सही ग़ुरबत,
सो लिया मैं भूखे पेट, और शायद जागा कई रातें तेरे बग़ैर
आ मुझे फिर अपनी गोद में लिटा, मेरे बालो में अपनी उंगलिया सहला
माँ तेरे आँचल में सिमट जाना चाहता हूँ
आज मैं फिर बच्चा बन जाना चाहता हूँ |

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